Dharam Desk: सनातन धर्म में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके अंतिम संस्कार का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव होता है—‘अस्थि विसर्जन’। युगों-युगों से यह परंपरा चली आ रही है कि शवदाह के बाद बची हुई अस्थियों को पवित्र गंगा नदी में ही प्रवाहित किया जाता है।
आखिर गंगा में ही अस्थियां विसर्जित करने के पीछे क्या वजह है? क्या यह केवल एक धार्मिक विश्वास है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक कारण भी छिपा है? आइए समझते हैं इस विशेष रिपोर्ट में।
धार्मिक और पौराणिक मान्यता: मोक्ष की प्राप्ति
शास्त्रों और पुराणों (जैसे गरुड़ पुराण व रामायण) के अनुसार, मां गंगा को केवल एक नदी नहीं बल्कि ‘मोक्षदायिनी’ माना गया है।
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राजा भागीरथ की कथा: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, राजा भागीरथ अपने पूर्वजों (राजा सगर के 60 हजार पुत्रों) की आत्मा की शांति और उन्हें मुक्ति दिलाने के लिए ही मां गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाए थे। गंगाजल के स्पर्श मात्र से उनके पूर्वजों के पाप नष्ट हो गए और उन्हें मोक्ष मिला।
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आत्मा की पूर्ण मुक्ति: हिंदू धर्म के अनुसार, शरीर पंचतत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) से मिलकर बना है। अस्थियां शरीर का अंतिम अवशेष होती हैं। जब इन्हें गंगाजल में विसर्जित किया जाता है, तो भौतिक शरीर का मोह समाप्त हो जाता है और आत्मा को सद्गति (स्वर्ग लोक) प्राप्त होती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण: नदियों का संतुलन और त्वरित विसर्जन
वैज्ञानिक और पर्यावरण के विशेषज्ञों के अनुसार, गंगा नदी में अस्थि विसर्जन के पीछे वैज्ञानिक कारण भी हैं:
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फास्फोरस और कैल्शियम का मिश्रण: मानव अस्थियों (हड्डियों) में मुख्य रूप से कैल्शियम और फास्फोरस होता है। जब ये पवित्र जल में विलीन होते हैं, तो यह जलीय जीवों और जलीय पर्यावरण के लिए पोषण का काम करते हैं।
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गंगाजल की अनूठी संरचना: सामान्य पानी में हड्डियों को पूरी तरह से गलने में लंबा समय लगता है, लेकिन गंगा जल में मौजूद विशेष खनिजों और गंधक (Sulfur) की प्रचुरता के कारण अस्थियां बहुत जल्दी जल में घुल जाती हैं।
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जल की शुद्धता: वैज्ञानिकों ने कई शोधों में पाया है कि गंगाजल में ऐसे बैक्टीरिया (बैक्टीरियोफेज) पाए जाते हैं जो हानिकारक विषाणुओं को नष्ट कर देते हैं, जिससे पानी लंबे समय तक सड़ता नहीं है।
नियमों का पालन भी जरूरी
ज्योतिष और धर्मशास्त्रियों के अनुसार, अस्थि विसर्जन करते समय कुछ नियमों का ध्यान रखना अनिवार्य है:
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समय सीमा: दाह संस्कार के 3 से 10 दिनों के भीतर अस्थि विसर्जन करना सबसे शुभ माना जाता है।
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पर्यावरण की रक्षा: विसर्जन के समय केवल अस्थियों और राख को जल में अर्पित करें। पॉलिथीन, प्लास्टिक की थैलियां या कपड़े नदी में न बहाएं, ताकि मां गंगा की स्वच्छता बनी रहे।
गंगा में अस्थि विसर्जन केवल एक कर्मकांड नहीं, बल्कि श्रद्धा, पर्यावरण और आध्यात्मिक शांति का संगम है। यही वजह है कि देश-विदेश से लोग अपने परिजनों की अंतिम यात्रा के इस चरण को पूरा करने के लिए हरिद्वार, प्रयागराज और काशी (वाराणसी) के गंगा घाटों पर पहुंचते हैं।


