बताया जाता है कि नाना पाटेकर एक महंगी कार खरीदने वाले थे। कार के कागजात तैयार हो चुके थे और अगले दिन उन्हें कार की डिलीवरी लेनी थी। लेकिन डिलीवरी से ठीक एक शाम पहले उन्होंने एक किसान की आत्महत्या की खबर देखी। किसान की मौत से ज्यादा उसके पीछे छूट गए परिवार की हालत ने उन्हें झकझोर दिया।
नाना पाटेकर को लगा कि जब किसान का परिवार आंसुओं में डूबा है, तब वे उन्हीं पैसों से अपने लिए कार कैसे खरीद सकते हैं। उन्होंने तुरंत अपने एक दोस्त से संपर्क किया और कार खरीदने के लिए रखी करीब डेढ़ करोड़ रुपये की रकम किसानों की मदद के लिए दे दी।
यह किस्सा हाल के वर्षों में फिल्म ‘अग्नि साक्षी’ के लेखक रणबीर पुष्प ने भी साझा किया था। उनके मुताबिक, किसान की आत्महत्या की खबर ने नाना पाटेकर को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने कार खरीदने का अपना फैसला बदल दिया और पूरी रकम जरूरतमंद किसानों तक पहुंचाने का रास्ता चुना।
बिना शोर किए किसानों की मदद
किसानों की मदद करने का नाना पाटेकर का तरीका हमेशा सुर्खियां बटोरने वाला नहीं रहा। वे अक्सर बिना किसी प्रचार के जरूरतमंदों तक पहुंचते रहे। अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर उन्होंने NAAM फाउंडेशन की स्थापना की, जिसके जरिए महाराष्ट्र के विदर्भ, लातूर और उस्मानाबाद जैसे इलाकों में किसानों की मदद के लिए काम किया गया।
नाना पाटेकर गांवों में जाते, किसानों से सीधे मिलते और उनकी समस्याएं समझने की कोशिश करते थे। पानी की समस्या और सूखे से निपटने के लिए भी उन्होंने कई स्तरों पर काम किया। गांवों में चेक डैम और तालाब बनाने जैसी पहलों को बढ़ावा देने में भी उनकी भूमिका रही।
वे किसानों को ‘अन्नदाता’ कहते थे और उनसे आत्महत्या जैसा कदम न उठाने की अपील करते थे। उनका मानना था कि किसानों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए खुद भी आवाज उठानी चाहिए और यह तय करना चाहिए कि वे किसे सत्ता में देखना चाहते हैं। किसानों की बदहाली को लेकर उन्होंने कई मौकों पर सरकारों से भी सवाल किए।
गुस्सा आता था, लेकिन वजह भी होती थी
नाना पाटेकर की छवि एक बेबाक और गुस्सैल अभिनेता की रही है। लेकिन उनके गुस्से के पीछे अक्सर कोई वजह होती थी। रणबीर पुष्प द्वारा सुनाया गया एक किस्सा इसका उदाहरण है।
एक बार नाना ने सड़क पर एक कार से किसी व्यक्ति को बोतल फेंकते हुए देखा। उन्होंने सड़क पर पड़ी उस बोतल को उठाया और कार का पीछा करके उसे रुकवाया। इसके बाद उन्होंने ड्राइवर से खिड़की नीचे करने को कहा।
इत्तेफाक से उसी चौराहे पर महात्मा गांधी की तस्वीर वाला स्वच्छ भारत अभियान का एक होर्डिंग लगा था। नाना ने उसकी ओर इशारा करते हुए ड्राइवर से सवाल किया कि क्या इसी तरह देश को महान बनाया जाएगा।
उन्होंने उसे समझाते हुए कहा कि गांधी जी इस दुनिया से चले गए, लेकिन हम अभी यहां हैं। देश को साफ रखना हमारी जिम्मेदारी है। यहां तक कि उन्होंने ड्राइवर से यह भी पूछा कि अगर सड़क पर बोतल फेंकना ठीक है, तो क्या वे उसकी कार को ही कूड़ेदान समझकर उसमें बोतल फेंक दें?
नाना पाटेकर की यही बेबाकी और संवेदनशीलता उन्हें बाकी लोगों से अलग बनाती रही। पर्दे पर उनका किरदार चाहे जितना सख्त हो, असल जिंदगी में किसानों और जरूरतमंदों के लिए उनका संवेदनशील चेहरा ही उनकी सबसे बड़ी पहचान बना।
उनकी मदद की कहानियां इसलिए खास हैं क्योंकि उन्होंने केवल मंच से बातें नहीं कीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर अपनी निजी संपत्ति और समय तक समाज के लिए समर्पित किया। यही वजह है कि नाना पाटेकर को उनके प्रशंसक सिर्फ एक बेहतरीन अभिनेता के तौर पर नहीं, बल्कि असल जिंदगी के ‘रियल हीरो’ के रूप में भी याद करते हैं। :::


