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हरियाणा का 590 करोड़ का बैंकिंग घोटाला: CBI की रडार पर रसूखदार अधिकारी

चंडीगढ़: आईडीएफसी फर्स्ट बैंक में हरियाणा के सरकारी खातों से हुए 590 करोड़ रुपये के महाघोटाले में सीबीआई (CBI) की आर्थिक अपराध शाखा ने अपनी जांच का दायरा बढ़ा दिया है। जांच एजेंसी का मुख्य उद्देश्य उस ‘नेक्सस’ को बेनकाब करना है, जिसने सरकारी फंड को निजी फायदे के लिए इस्तेमाल किया।

जांच के केंद्र में ‘गोल्ड’ और ‘कमीशन’ का कनेक्शन

सीबीआई की जांच अब भ्रष्टाचार की उन परतों को उधेड़ने में जुटी है, जहाँ पैसों का लेन-देन व्यक्तिगत लाभ के लिए किया गया:

  • मास्टरमाइंड की तलाश: एजेंसी यह पता लगा रही है कि इस पूरे खेल के पीछे असली दिमाग किसका था और किस अधिकारी ने फाइल आगे बढ़ाने के लिए कितना कमीशन लिया।

  • सोने की चमक और रसूख: जांच में यह चौंकाने वाला एंगल भी सामने आया है कि कमीशन के तौर पर किसने कितनी नकदी और किसने ‘गोल्ड’ (सोना) लिया। इसके लिए चंडीगढ़ और पंचकूला के बड़े ज्वैलर्स से भी पूछताछ की जा रही है।

  • दस्तावेजों का मिलान: एसीबी (ACB) द्वारा जुटाए गए सबूतों को आधार बनाकर सीबीआई अब बैंक ट्रांजेक्शन का सरकारी फाइलों से मिलान कर रही है।

इन अधिकारियों की बढ़ी मुश्किलें

घोटाले की आंच अब विभाग के बड़े पदों पर बैठे अधिकारियों तक पहुंच चुकी है। जांच के घेरे में मुख्य रूप से तीन नाम सामने आ रहे हैं:

  1. अमित दीवान: डायरेक्टर फाइनेंस (HPGCL) – अंतरिम बेल खत्म होने के बाद कोर्ट के आदेशानुसार सरेंडर की प्रक्रिया में हैं। सीबीआई उनकी 5 दिन की रिमांड की तैयारी में है।

  2. राजेश सांगवान: कंट्रोलर फाइनेंस (हरियाणा मार्केटिंग बोर्ड)।

  3. रणधीर सिंह: हरियाणा शिक्षा बोर्ड।

सरकारी फंड को बनाया ‘निजी जागीर’

जांच में सामने आया है कि हरियाणा मार्केटिंग बोर्ड, शिक्षा बोर्ड और पावर कॉर्पोरेशन के फंड के साथ बड़े स्तर पर खिलवाड़ किया गया। बैंक अधिकारियों और सरकारी बाबूओं की मिलीभगत से जनता के पैसे को खुर्द-बुर्द किया गया। सीबीआई अब बैंकिंग और सरकारी रिकॉर्ड्स के जरिए भ्रष्टाचार के इस जाल को पूरी तरह तोड़ने की कोशिश कर रही है।

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