शिव कथा: आखिर क्यों महादेव ने अपने कंठ में धारण किया था विष?

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Dharam Desk: भगवान शिव, जिन्हें हम महादेव, नीलकंठ और भोलेनाथ जैसे अनंत नामों से पुकारते हैं, भारतीय अध्यात्म के केंद्र हैं। उनकी कथा मात्र एक कहानी नहीं, बल्कि जीवन दर्शन है। भगवान शिव ‘अनादि’ हैं (जिनका कोई आरंभ नहीं) और ‘अनंत’ हैं (जिनका कोई अंत नहीं)। आइए, महादेव के स्वरूप और उनकी महिमा की इस पावन कथा को विस्तार से समझते हैं।

सृष्टि का आरंभ और शिव का प्राकट्य

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब सृष्टि में कुछ भी नहीं था, न आकाश, न पृथ्वी और न ही समय, तब केवल ‘शून्य’ था। उसी शून्य से एक दिव्य प्रकाश पुंज प्रकट हुआ, जिसे ‘शिवलिंग’ का स्वरूप माना जाता है। इसी ज्योतिपुंज से ब्रह्मा जी (सृजन के देवता) और विष्णु जी (पालन के देवता) की उत्पत्ति हुई। जब इन दोनों के बीच श्रेष्ठता को लेकर विवाद हुआ, तब शिव ने एक विशाल अग्नि स्तंभ के रूप में प्रकट होकर उन्हें समझाया कि वे दोनों एक ही परम शक्ति के दो अंग हैं। इस प्रकार शिव को ‘देवों का देव’ यानी महादेव कहा गया।

भोलेनाथ और माता सती की कथा

शिव के गृहस्थ जीवन की कथा माता सती से आरंभ होती है। प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने कठोर तपस्या कर शिव को पति रूप में प्राप्त किया। किंतु, दक्ष शिव के वैरागी स्वरूप से घृणा करते थे। एक बार दक्ष ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया लेकिन शिव को आमंत्रित नहीं किया। अपने पति का अपमान सहन न कर पाने के कारण सती ने यज्ञ की अग्नि में आत्मदाह कर लिया। सती के विरह में शिव ने तांडव किया और पूरी सृष्टि थर्रा उठी। अंततः, माता सती ने ही पर्वतराज हिमालय के घर ‘पार्वती’ के रूप में पुनर्जन्म लिया और अपनी भक्ति से महादेव को पुनः प्राप्त किया। शिव और शक्ति का यह मिलन पुरुष और प्रकृति के संतुलन का प्रतीक है।

नीलकंठ: संसार के रक्षक

शिव की महिमा का सबसे बड़ा उदाहरण ‘समुद्र मंथन’ की कथा है। जब देवताओं और असुरों ने अमृत के लिए समुद्र मथा, तो सबसे पहले ‘हलाहल’ नामक भयंकर विष निकला। उस विष की ज्वाला से पूरी सृष्टि जलने लगी। तब सभी देव महादेव की शरण में पहुंचे। शिव ने बिना किसी संकोच के उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका गला नीला पड़ गया, और वे ‘नीलकंठ’ कहलाए। यह कथा हमें सिखाती है कि दूसरों के दुखों को अपनाकर ही कोई ‘महादेव’ बनता है।

शिव का स्वरूप और संदेश

शिव का स्वरूप अत्यंत विचित्र और शिक्षाप्रद है। उनके मस्तक पर चंद्रमा शीतलता का, गले में सांप काल (समय) पर नियंत्रण का, और जटाओं से बहती गंगा ज्ञान की पवित्र धारा का प्रतीक है। वे श्मशान में रहते हैं और शरीर पर भस्म लगाते हैं, जो हमें याद दिलाता है कि यह संसार नश्वर है और अंत में सब कुछ मिट्टी में मिल जाना है। वे वैरागी भी हैं और श्रेष्ठ गृहस्थ भी; वे संहारक भी हैं और परम दयालु रक्षक भी।

महाशिवरात्रि और भक्ति

शिव की भक्ति का सबसे बड़ा पर्व महाशिवरात्रि है, जो शिव और शक्ति के विवाह का उत्सव है। शिव की पूजा में किसी आडंबर की आवश्यकता नहीं होती। वे केवल एक लोटा जल और बेलपत्र से प्रसन्न हो जाते हैं, इसीलिए उन्हें ‘आशुतोष’ (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) कहा जाता है।

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