Dharam Desk: सनातन परंपरा में भगवान शिव को ‘महादेव’ कहा गया है, जिसका अर्थ है देवों के देव। वे स्वयंभू हैं—यानी जिनका न कोई आदि (शुरुआत) है और न ही अंत। वे संहारक भी हैं और परम कल्याणकारी भी। शिव की महिमा और उनके जीवन से जुड़ी कई कथाएँ हैं, लेकिन उनमें से ‘समुद्र मंथन और विषपान’ तथा ‘माता सती व पार्वती संग उनका दिव्य प्रेम’ सबसे प्रमुख और प्रेरणादायक हैं।
1. नीलकंठ की कथा: जब शिव ने बचाया ब्रह्मांड
एक बार देवताओं और असुरों के बीच समुद्र मंथन हुआ, ताकि अमृत प्राप्त किया जा सके। मंथन के दौरान अमृत से पहले ‘हलाहल’ नामक अत्यंत भयंकर और विषैला विष निकला। वह विष इतना तीव्र था कि उसकी लपटों और धुएँ से तीनों लोक जलने लगे। समस्त सृष्टि और जीव-जंतु त्राहि-त्राहि कर उठे।
जब कोई भी उस विष के प्रभाव को रोकने में सक्षम नहीं हुआ, तब सभी देवता और ऋषि-मुनि भगवान शिव की शरण में पहुँचे। सृष्टि की रक्षा के लिए शिव ने उस भयानक विष को पीने का निर्णय लिया। उन्होंने हलाहल विष को अपनी अंजलि में लिया और उसे पी गए।
नीलकंठ नाम कैसे पड़ा: शिव ने विष को अपने गले (कंठ) से नीचे नहीं उतरने दिया, बल्कि उसे कंठ में ही रोक लिया। विष के तीव्र प्रभाव के कारण उनका गला नीला पड़ गया। तभी से भगवान शिव को पूरे ब्रह्मांड में ‘नीलकंठ’ के नाम से जाना जाने लगा। इस कथा से सीख मिलती है कि समाज और संसार के कल्याण के लिए कभी-कभी हमें दूसरों के दुखों और बुराइयों रूपी विष को अपने भीतर समाहित करना पड़ता है।
2. शिव और शक्ति का अटूट बंधन
शिव एकाकी और वैरागी हैं, जो श्मशान में निवास करते हैं और भस्म रमाते हैं। लेकिन प्रकृति के संतुलन के लिए उनका ‘शक्ति’ से मिलना अनिवार्य था। माता सती के रूप में आदि शक्ति ने राजा दक्ष के घर जन्म लिया और कठोर तपस्या कर शिव को पति रूप में प्राप्त किया।
प्रसंगवश, जब राजा दक्ष ने शिव का अपमान किया, तो सती ने यज्ञ कुंड में कूदकर अपनी देह त्याग दी। सती के वियोग में शिव अत्यंत क्रोधित और गहरे शोक में डूब गए। वे सती के पार्थिव शरीर को लेकर तीनों लोकों में भटकने लगे, जिससे सृष्टि का संतुलन बिगड़ने लगा। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े किए, जो धरती पर जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ ‘शक्तिपीठों’ की स्थापना हुई।
इसके बाद, शिव पुनः गहरी समाधि में चले गए। माता सती ने अगला जन्म पार्वती के रूप में हिमाचल राज के घर लिया। शिव को पुनः प्राप्त करने के लिए माता पार्वती ने जंगलों में कंद-मूल खाकर और घोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने अपनी समाधि तोड़ी और पार्वती को अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। शिव और पार्वती का यह मिलन ‘शिव-शक्ति’ के पूर्ण स्वरूप को दर्शाता है, जो गृहस्थ जीवन और अध्यात्म के सुंदर संतुलन का प्रतीक है।
शिव का स्वरूप और संदेश
शिव की जटाओं में बहती गंगा ज्ञान के पवित्र प्रवाह का प्रतीक हैं, उनके माथे पर लगा त्रिपंड और तीसरी आँख विवेक व अंतर्दृष्टि को दर्शाती है, गले का सर्प काल (समय) पर उनके नियंत्रण को दिखाता है और उनके हाथ का त्रिशूल जीवन के तीन तापों (दैहिक, दैविक, भौतिक) को नष्ट करता है।
भगवान शिव की कथा हमें सिखाती है कि बाहरी चमक-धमक से दूर रहकर शांत मन से कैसे जिया जाए। वे जहाँ एक ओर अत्यंत भोले हैं (भोलेनाथ) जो एक लोटा जल से प्रसन्न हो जाते हैं, वहीं दूसरी ओर अन्याय के खिलाफ उनका ‘तांडव’ अधर्म का विनाश करता है। उनकी कथा हर मनुष्य को संयम, परोपकार और विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रहने की प्रेरणा देती है।



