धर्म डेस्क: सनातन धर्म में भगवान शिव को ‘आशुतोष’ कहा गया है, यानी जो शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं। महादेव को प्रसन्न करने के कई तरीके हैं, लेकिन गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित ‘रुद्राष्टकम’ का अपना एक विशेष स्थान है। मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धापूर्वक इसका गान करता है, उसके जीवन से नकारात्मकता का नाश होता है और उसे परम शांति की प्राप्ति होती है।
क्यों खास है रुद्राष्टकम?
रामचरितमानस के उत्तरकांड में वर्णित यह स्तुति संस्कृत के अद्भुत छंदों से सजी है। इसकी महिमा के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
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पापों से मुक्ति: नियमित पाठ करने से अनजाने में हुए पापों का प्रायश्चित होता है।
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मानसिक शक्ति: यह स्तुति आत्मविश्वास बढ़ाती है और डिप्रेशन या मानसिक तनाव को दूर करने में सहायक है।
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सकारात्मक ऊर्जा: घर में इसके पाठ से वास्तु दोष और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव खत्म होता है।
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विशेष फल: सोमवार, प्रदोष व्रत और महाशिवरात्रि जैसे पावन अवसरों पर इसका पाठ ‘सिद्ध फल’ प्रदान करता है।
रुद्राष्टकम: मूल पाठ एवं हिंदी अर्थ (प्रमुख अंश)
श्लोक 1:
नमामीशमीशान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेद स्वरूपं। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं, चिदाकाश माकाश वासं भजेऽहं॥
अर्थ: हे मोक्ष स्वरूप, विभु, व्यापक, ब्रह्म और वेद स्वरूप ईशान दिशा के ईश्वर! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। आप अपने स्वरूप में स्थित, निर्गुण, निर्विकल्प, निरीह (इच्छा रहित), चेतन आकाश रूप और आकाश में ही निवास करने वाले प्रभु को मैं भजता हूँ।
श्लोक 2:
करालं महाकाल कालं कृपालं, गुणागार संसार पारं नतोऽहं। तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं, मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं॥
अर्थ: जो काल के भी काल महाकाल हैं, कृपालु हैं और गुणों के भंडार हैं। जो संसार के पार जाने वाले हैं, उन्हें मैं प्रणाम करता हूँ। जिनका शरीर हिमालय के समान श्वेत और गंभीर है तथा जिनके स्वरूप में करोड़ों कामदेवों की आभा चमकती है।
कैसे करें पाठ? (विधि और नियम)
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शुद्धिकरण: प्रातः काल स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
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स्थान: भगवान शिव की प्रतिमा या शिवलिंग के समक्ष घी का दीपक जलाएं।
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लय और एकाग्रता: रुद्राष्टकम का पाठ लयबद्ध तरीके से करना चाहिए। यदि संस्कृत कठिन लगे, तो इसके अर्थ का मनन करें।
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अर्पण: पाठ के अंत में महादेव को जल या बेलपत्र अर्पित करें।
विशेष लाभ के दिन
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सोमवार: चंद्रमा और मन की शांति के लिए।
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प्रदोष काल: कर्ज मुक्ति और अटके हुए कार्यों की पूर्ति के लिए।
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मासिक शिवरात्रि: आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए।
निष्कर्ष: ‘रुद्राष्टकम’ केवल एक स्तुति नहीं, बल्कि महादेव से जुड़ने का एक सीधा माध्यम है। यह भक्त को अहंकार से मुक्त कर ईश्वर की शरणागति प्रदान करता है।
