Haryana Desk: नई दिल्ली में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव और जननायक जनता पार्टी (JJP) के युवा प्रदेशाध्यक्ष दिग्विजय सिंह चौटाला के बीच हुई करीब डेढ़ घंटे की मुलाकात ने देश की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। इस लंबी बैठक के बाद दिग्विजय चौटाला ने संकेत दिए कि हरियाणा के मौजूदा राजनीतिक हालातों पर विस्तार से चर्चा हुई है। हालांकि औपचारिक रूप से इसे ‘शिष्टाचार भेंट’ बताया जा रहा है, लेकिन सियासी विशेषज्ञ इसे 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव और हरियाणा में जेजेपी के पुनरुद्धार से जोड़कर देख रहे हैं।
पश्चिमी यूपी में ‘जाट कार्ड’ की तैयारी समाजवादी पार्टी के लिए यह मुलाकात रणनीतिक रूप से बेहद अहम मानी जा रही है। जयंत चौधरी की आरएलडी (RLD) के भाजपा गठबंधन में जाने के बाद, अखिलेश यादव पश्चिमी उत्तर प्रदेश में एक मजबूत जाट चेहरे की तलाश में हैं। पश्चिमी यूपी की कई सीटों पर जाट मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं। ऐसे में जेजेपी जैसी जाट आधार वाली पार्टी के साथ हाथ मिलाकर अखिलेश यादव जाट+यादव+मुस्लिम का एक नया और शक्तिशाली समीकरण तैयार करने की कोशिश कर रहे हैं, जो भाजपा की घेराबंदी कर सके।
जेजेपी के लिए ‘संजीवनी’ की तलाश दूसरी ओर, हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 में एक भी सीट न जीत पाने वाली जेजेपी के लिए यह गठबंधन किसी ‘संजीवनी’ से कम नहीं होगा। भाजपा से अलग होने के बाद जेजेपी अपनी खोई हुई सियासी जमीन तलाश रही है। दिग्विजय चौटाला के जरिए अखिलेश यादव से बढ़ती नजदीकियां यह बताती हैं कि जेजेपी अब क्षेत्रीय राजनीति से निकलकर उत्तर भारत के एक बड़े विपक्षी गठबंधन का हिस्सा बनने की राह पर है। यदि यह गठबंधन होता है, तो जेजेपी को यूपी में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का मौका मिलेगा।
2027 का रण और विपक्षी एकता राजनीति के जानकारों का मानना है कि अखिलेश यादव अब खुद को केवल उत्तर प्रदेश तक सीमित नहीं रखना चाहते। वे उत्तर भारत में विपक्ष का एक बड़ा चेहरा बनने की ओर अग्रसर हैं। अगर सपा और जेजेपी का मेल होता है, तो इसका असर न केवल यूपी के 2027 चुनाव पर पड़ेगा, बल्कि हरियाणा की राजनीति में भी सपा की एंट्री हो सकती है। फिलहाल सबकी नजरें दुष्यंत चौटाला के रुख पर टिकी हैं, क्योंकि यह गठबंधन उत्तर भारत के पूरे राजनीतिक समीकरण को बदलने की ताकत रखता है।
