Dharam Desk: आज 19 मार्च से चैत्र नवरात्रि का शुभारंभ हो गया है, जो 27 मार्च तक चलेगी। हिंदू नववर्ष के साथ शुरू होने के कारण इसे साल की पहली नवरात्रि माना जाता है। वसंत ऋतु के आगमन पर होने के कारण इसे ‘वासंती नवरात्र’ भी कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार, साल में दो बार—वसंत और शरद ऋतु में—देवी की विशेष आराधना की जाती है। पहले दिन शुभ मुहूर्त में घट स्थापना के साथ मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा का संकल्प लिया जाता है।
घट स्थापना: पंचतत्वों का प्रतीक
नवरात्रि में कलश (घट) स्थापना का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। मिट्टी का कलश पृथ्वी, उसमें भरा जल जल और वायु, और पास जलता दीपक अग्नि तत्व का प्रतीक है। कलश में ब्रह्मांड की सकारात्मक ऊर्जा यानी आकाश तत्व का आवाहन किया जाता है। माना जाता है कि सृष्टि की उत्पत्ति जल से हुई है और इसमें सभी देवी-देवताओं का वास होता है, इसलिए शक्ति की पूजा से पहले कलश स्थापित करना अनिवार्य है।
नवरात्रि व्रत और विज्ञान: ‘ऑटोफेजी’ का चमत्कार
आयुर्वेद और आधुनिक विज्ञान दोनों ही नवरात्रि व्रत का समर्थन करते हैं। वसंत ऋतु के बदलाव के समय बीमारियां बढ़ने की आशंका रहती है, ऐसे में उपवास शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करता है।
-
नोबेल पुरस्कार का प्रमाण: जापानी वैज्ञानिक योशिनोरी ओशुमी को 2016 में ‘ऑटोफेजी’ प्रक्रिया समझाने के लिए नोबेल मिला था। इस प्रक्रिया में व्रत के दौरान शरीर अपनी कमजोर कोशिकाओं को नष्ट कर नई ऊर्जा बनाता है।
-
कोशिकाओं की मजबूती: अमेरिकी शोध के अनुसार, उपवास शरीर को एक सकारात्मक तनाव (Stress) में डालता है, जिससे कोशिकाएं मजबूत होती हैं और उम्र बढ़ने की गति धीमी हो जाती है।
व्रत के नियम: केवल भोजन ही नहीं, विचारों का भी संयम
नवरात्रि का व्रत केवल भूखा रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह तीन स्तरों पर किया जाता है:
-
मानसिक व्रत: मन से काम, क्रोध, लोभ और नकारात्मक विचारों का त्याग करना।
-
वाचिक व्रत: हमेशा सत्य बोलना और वाणी से किसी को ठेस न पहुँचाना।
-
कायिक व्रत: शरीर से किसी भी प्रकार की हिंसा न करना और सात्विक आहार ग्रहण करना।
नौ देवियों की पूजा की परंपरा
देवी भागवत और मार्कंडेय पुराण के अनुसार, नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ अलग-अलग रूपों (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, आदि) की पूजा का विधान है। हालांकि, भक्त चाहें तो पूरे नौ दिनों तक केवल मां दुर्गा के मूल स्वरूप की आराधना भी कर सकते हैं। यह शास्त्रीय परंपरा 8वीं सदी के प्राचीन ग्रंथों से चली आ रही है, जो नारी शक्ति और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के महत्व को दर्शाती है।