भक्त कन्नप्पा: निस्वार्थ भक्ति और सर्वोच्च नेत्र-दान की अमर गाथा

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Dharam Desk: भगवान शिव के परम भक्तों की जब भी बात आती है, तो कन्नप्पा (Kannappa) का नाम सबसे ऊपर लिया जाता है। उनकी भक्ति की कहानी इतनी निश्छल और भावुक है कि स्वयं महादेव को उनके सामने प्रकट होना पड़ा था।

कौन थे कन्नप्पा?

कन्नप्पा का जन्म एक शिकारी परिवार में हुआ था और उनका नाम थिन्ना था। वे दक्षिण भारत के कालहस्ती (वर्तमान आंध्र प्रदेश) के जंगलों में रहते थे। वे अनपढ़ थे और उन्हें शास्त्रों या पूजा-विधि का कोई ज्ञान नहीं था, लेकिन उनके हृदय में शिव के प्रति अगाध प्रेम था।

भक्ति का अनोखा तरीका

थिन्ना रोज़ शिकार पर जाते समय शिव लिंग (श्री कालहस्तीश्वर) के पास रुकते थे। उनकी पूजा करने का तरीका दुनिया से बिल्कुल अलग था:

  • अभिषेक: वे अपने मुँह में नदी का जल भरकर लाते थे और उसे शिवलिंग पर छिड़क देते थे।

  • नैवेद्य: वे जो मांस शिकार करते थे, उसे पहले चखते थे ताकि यह सुनिश्चित कर सकें कि वह स्वादिष्ट है, और फिर उसे शिव को अर्पित करते थे।

  • सफाई: वे अपने जूतों से शिवलिंग के आसपास की धूल साफ करते थे।

यद्यपि यह विधि शास्त्रों के विरुद्ध थी, लेकिन उनकी ‘श्रद्धा’ इतनी शुद्ध थी कि भगवान शिव ने उसे प्रेमपूर्वक स्वीकार किया।

कठिन परीक्षा: दो आँखों का दान

मंदिर के पंडित यह सब देखकर परेशान रहते थे कि कोई अशुद्ध तरीके से पूजा कर रहा है। उनकी शंका दूर करने के लिए भगवान शिव ने एक लीला रची।

  1. पहली आँख: एक दिन जब थिन्ना पूजा कर रहे थे, तो उन्होंने देखा कि शिवलिंग की एक आँख से रक्त बह रहा है। थिन्ना घबरा गए और जड़ी-बूटियाँ लगाने लगे, पर खून नहीं रुका। अंत में, उन्होंने अपनी एक आँख तीर से निकाल ली और शिव की आँख पर लगा दी। खून रुक गया।

  2. दूसरी आँख: कुछ ही क्षण बाद दूसरी आँख से भी खून बहने लगा। अब थिन्ना ने अपनी दूसरी आँख भी दान करने का निर्णय लिया। लेकिन उन्हें डर था कि अगर वे अपनी दूसरी आँख भी निकाल लेंगे, तो उन्हें दिखाई नहीं देगा कि आँख लगानी कहाँ है।

  3. निशानी: उन्होंने अपना पैर शिवलिंग की दूसरी आँख पर रख दिया ताकि उन्हें जगह का पता रहे, और अपनी दूसरी आँख निकालने ही वाले थे।

कन्नप्पा नाम कैसे पड़ा?

जैसे ही थिन्ना अपनी दूसरी आँख निकालने वाले थे, भगवान शिव प्रकट हुए और उनका हाथ थाम लिया। शिव उनकी निस्वार्थ भक्ति से अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने थिन्ना की दोनों आँखें ठीक कर दीं और उन्हें ‘कन्नप्पा’ नाम दिया।

‘कन्न’ का अर्थ है ‘आँख’ और ‘अप्पा’ का अर्थ है ‘पिता/सम्मानित व्यक्ति’।

कन्नप्पा की भक्ति का सार

कन्नप्पा की कहानी हमें सिखाती है कि भगवान को दिखावा, मंत्र या विधि नहीं चाहिए। वे केवल भाव के भूखे हैं। जहाँ समर्पण (Surrender) पूर्ण होता है, वहाँ भगवान स्वयं दौड़े चले आते हैं।

आज भी श्री कालहस्ती मंदिर में कन्नप्पा की पूजा की जाती है और उन्हें 63 नयनारों (शिव के महान भक्त) में से एक माना जाता है।

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