राज्यसभा में ‘आप’ का शक्ति परीक्षण: क्या राघव चड्ढा बचा पाएंगे अपनी सदस्यता? जानें क्या कहता है दलबदल विरोधी कानून

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चंडीगढ़: आम आदमी पार्टी (AAP) के राज्यसभा सांसदों द्वारा पाला बदलकर भाजपा में शामिल होने की खबरों ने देश के राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। राघव चड्ढा के नेतृत्व में सांसदों के एक गुट ने भाजपा का दामन थाम लिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन सांसदों की सदस्यता बरकरार रहेगी या उन्हें दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा।

आइए विस्तार से समझते हैं इस मामले के कानूनी और राजनीतिक पहलू:

क्या है सदस्यता बचाने का ‘दो-तिहाई’ फॉर्मूला?

संविधान की 10वीं अनुसूची के अनुसार, यदि कोई निर्वाचित सांसद अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है। लेकिन, इसमें एक विशेष छूट दी गई है:

  • विलय का नियम: यदि किसी पार्टी के विधायी दल (Legislative Party) के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्य किसी दूसरी पार्टी में विलय (Merge) करने का फैसला करते हैं, तो उन पर दलबदल कानून लागू नहीं होता।

  • ‘आप’ का समीकरण: राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के कुल 10 सदस्य हैं। अपनी सदस्यता बचाने के लिए राघव चड्ढा को कम से कम 7 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता है।

राघव चड्ढा का दावा बनाम जमीनी हकीकत

राघव चड्ढा ने दावा किया है कि उनके पास 7 सांसदों का समर्थन है और उन्होंने इससे संबंधित दस्तावेज राज्यसभा के सभापति को सौंप दिए हैं।

  • सांसदों के नाम: चड्ढा ने हरभजन सिंह, राजिंदर गुप्ता, विक्रम साहनी और स्वाति मालीवाल जैसे नामों का जिक्र किया है।

  • पेंच: हालांकि, चड्ढा समेत तीन सांसदों ने तो भाजपा ज्वाइन कर ली है, लेकिन बाकी सांसदों ने अभी तक सार्वजनिक तौर पर कोई घोषणा नहीं की है। यदि यह संख्या 7 से कम रहती है, तो इन सभी की सदस्यता खतरे में पड़ सकती है।

राघव चड्ढा ने क्यों छोड़ा साथ?

एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान राघव चड्ढा ने पार्टी छोड़ने के पीछे अपनी सफाई दी। उन्होंने कहा:

“मैं उनके अपराधों का हिस्सा नहीं बनना चाहता था। हमारे पास दो ही विकल्प थे—या तो राजनीति छोड़ दें या फिर अपनी ऊर्जा के साथ सकारात्मक राजनीति करें। इसलिए हमने संविधान के प्रावधानों का पालन करते हुए भाजपा में विलय का निर्णय लिया।”

स्वाति मालीवाल का सस्पेंस

स्वाति मालीवाल का मामला थोड़ा अलग है। वह पिछले एक साल से अरविंद केजरीवाल और पार्टी की नीतियों के खिलाफ मुखर रही हैं, लेकिन उन्होंने अभी तक औपचारिक रूप से किसी अन्य दल की सदस्यता नहीं ली है। चड्ढा के दावे में उनका नाम शामिल है, लेकिन उनकी अगली चाल क्या होगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है।

अंतिम निर्णय सभापति के हाथ में

संविधान के मुताबिक, दलबदल के आधार पर अयोग्यता का अंतिम निर्णय राज्यसभा के सभापति का होता है। यदि सभापति राघव चड्ढा द्वारा सौंपे गए दस्तावेजों और दो-तिहाई बहुमत के दावे से संतुष्ट होते हैं, तभी उनकी सदस्यता सुरक्षित रहेगी।

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