Dharam Desk: सनातन धर्म की दस महाविद्याओं में से एक, माता बगलामुखी के प्राकट्य और उनके द्वारा त्रिलोक को आतंक से मुक्त कराने का पूरा घटनाक्रम सामने आया है। पौराणिक साक्ष्यों और विद्वानों के अनुसार, ब्रह्मांड की रक्षा के लिए देवी ने दुष्ट राक्षस मदनासुर की जिह्वा (जीभ) काटकर उसके भयानक अत्याचारों का अंत कर दिया था।
इस घटना के बाद से ही माता बगलामुखी को ‘शत्रु नाशक’ और ‘वाक्-शक्ति’ की अधिष्ठात्री देवी के रूप में पूजा जाता है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर क्या था यह पूरा मामला और क्यों माता को काटना पड़ा था राक्षस का अंग।
त्रिलोक में मचा था हाहाकार, असुर को मिला था ‘वाक-सिद्धि’ का वरदान
सूत्रों के अनुसार, सतयुग के समय मदन (मदनासुर) नाम के एक शक्तिशाली राक्षस ने घोर तपस्या कर विशेष वरदान प्राप्त कर लिया था। उसे ‘वाक-सिद्धि’ का बल प्राप्त था, जिसका अर्थ था कि उसके मुख से निकला हर शब्द पत्थर की लकीर बन जाता था। इस शक्ति के मद में चूर होकर उसने देवताओं, ऋषियों और निर्दोष मनुष्यों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया।
मदनासुर जो भी अनिष्ट बोलता, वह तुरंत घटित हो जाता था। उसने अपनी वाणी के बल से तीनों लोकों के संतों की तपस्या भंग कर दी और पूरी सृष्टि के विनाश पर उतारू हो गया। जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई, तब देवराज इंद्र के नेतृत्व में सभी देवताओं ने भगवान विष्णु और महादेव की शरण ली।
हरिद्रा सरोवर से हुआ ‘पीताम्बरा’ का प्राकट्य
देवताओं की व्याकुलता और सृष्टि पर आए इस भीषण संकट को देखते हुए, भगवान विष्णु ने घोर तपस्या की। इसके बाद सौराष्ट्र (वर्तमान गुजरात) के ‘हरिद्रा सरोवर’ (हल्दी के तालाब) से महातेजस्विनी माता बगलामुखी का प्राकट्य हुआ। पीले रंग के इस सरोवर से प्रकट होने के कारण ही इन्हें ‘पीताम्बरा’ भी कहा जाता है। माता का रूप अत्यंत दिव्य, स्वर्णिम आभा से युक्त और शत्रुओं के मन में भय पैदा करने वाला था।
रणभूमि में ऐसे काटी गई मदनासुर की जिह्वा
सृष्टि को बचाने के लिए माता बगलामुखी और मदनासुर के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। मदनासुर अपनी वाक-शक्ति का उपयोग कर माता पर भी अमंगलकारी वचनों के बाण छोड़ने लगा। लेकिन जैसे ही उसने माता को भस्म करने या पराजित करने के लिए मुख खोला, देवी ने अपनी अलौकिक शक्ति से उसकी बुद्धि और वाणी को स्तम्भित (फ्रीज) कर दिया।
इससे पहले कि वह कुछ और बोल पाता, माता बगलामुखी ने बाएं हाथ से उसकी जिह्वा (जीभ) को कसकर पकड़ लिया और खींच लिया। इसके बाद उन्होंने अपने दाहिने हाथ में मौजूद मुद्गर (गदा) से उस पर प्रहार किया और उसकी जीभ काट दी। जीभ कटते ही उस राक्षस की विध्वंसकारी वाक-शक्ति हमेशा के लिए समाप्त हो गई और माता ने उसका वध कर देवताओं को अभयदान दिया।
आज भी प्रासंगिक है माता का यह स्वरूप
ज्योतिष और तंत्र शास्त्र के विशेषज्ञों का कहना है कि आज भी माता बगलामुखी की मूर्तियां और चित्र इसी ऐतिहासिक घटना को दर्शाते हैं, जिसमें माता एक हाथ से असुर की जीभ पकड़े हुए हैं।
विशेषज्ञों का मत: “यह घटना केवल एक राक्षस के वध की कहानी नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रतीक है कि जब समाज में कड़वी, झूठी और विनाशकारी वाणी का बोलबाला बढ़ जाता है, तो उसे रोकने के लिए कठोर कदम उठाने पड़ते हैं। कोर्ट-कचहरी के मामलों, राजनीति और वाद-विवाद में विजय पाने के लिए आज भी देश भर के श्रद्धालु, विशेषकर पंजाब और हिमाचल के शक्तिपीठों (जैसे नलखेड़ा और बनखंडी) में माता बगलामुखी की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।”



