महाभारत का वो महायोद्धा, जिसके पास थी माँ बगलामुखी की ‘स्तंभन शक्ति’; एक मिनट में खत्म कर सकता था युद्ध!

Sports Desk: महाभारत का युद्ध इतिहास के सबसे विनाशकारी युद्धों में से एक माना जाता है, जिसमें एक से बढ़कर एक शूरवीरों ने भाग लिया था। लेकिन इस महायुद्ध में एक ऐसा योद्धा भी था, जो अगर अपनी शक्ति का प्रयोग करता, तो महाभारत का परिणाम मात्र एक मिनट में तय हो सकता था। यह महान योद्धा कोई और नहीं, बल्कि भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र वीर बर्बरीक थे।

बहुत कम लोग जानते हैं कि बर्बरीक की इस असीम और अजेय शक्ति के पीछे दसों महाविद्याओं में से आठवीं महाविद्या माँ बगलामुखी (जिन्हें कुछ ग्रंथों में माँ कामाख्या या नवदुर्गा के सिद्ध रूप में भी वर्णित किया गया है) की कठिन तंत्र साधना थी। आइए न्यूज़ फॉर्मेट में जानते हैं माँ बगलामुखी और बर्बरीक के इस अद्भुत संबंध की पूरी कहानी:

कठिन गुप्त साधना से प्रसन्न हुईं माँ बगलामुखी

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, बर्बरीक बचपन से ही बेहद पराक्रमी और खोजी प्रवृत्ति के थे। अपनी माता अहिलावती के मार्गदर्शन में उन्होंने गुप्त शक्तियों को अर्जित करने का संकल्प लिया। बर्बरीक ने एक गुप्त सिद्ध पीठ पर बैठकर माँ बगलामुखी की घोर आराधना शुरू की। माँ बगलामुखी को तंत्र शास्त्र में ‘स्तंभन की देवी’ कहा जाता है, जो शत्रुओं की बुद्धि, सेना और हथियारों को जहाँ के तहाँ रोकने (स्तंभित करने) की क्षमता रखती हैं। बर्बरीक की कठिन तपस्या और यज्ञों से प्रसन्न होकर देवी प्रकट हुईं और उन्होंने बर्बरीक को संसार में अजेय होने का वरदान दिया।

उपहार में मिले तीन चमत्कारी ‘अमोघ बाण’

देवी की कृपा से बर्बरीक को तीन ऐसे दिव्य और अमोघ बाण प्राप्त हुए, जो संपूर्ण सृष्टि को नष्ट करने की ताकत रखते थे। इसी के बाद से वे दुनिया में ‘तीन बाणधारी’ के नाम से विख्यात हुए। इन बाणों की कार्यप्रणाली पूरी तरह से वैज्ञानिक और अचूक थी:

  1. पहला बाण: यह बाण उन सभी शत्रुओं और लक्ष्यों को चिह्नित (Mark) करता था, जिन्हें समाप्त करना होता था।

  2. दूसरा बाण: यह बाण उन लोगों या स्थानों को चिह्नित करता था, जिन्हें सुरक्षित बचाना होता था।

  3. तीसरा बाण: यह अंतिम बाण एक ही पल में उन सभी चिह्नित शत्रुओं का संहार करके वापस बर्बरीक के तरकश में लौट आता था।

माता को दिया ‘हारे का सहारा’ बनने का वचन

जब कुरुक्षेत्र में महाभारत का युद्ध छिड़ा, तो बर्बरीक ने भी इसमें शामिल होने की इच्छा जताई। घर से प्रस्थान करते समय उन्होंने अपनी माता को वचन दिया कि वे युद्ध क्षेत्र में जाकर निष्पक्ष रहेंगे और ‘जो भी पक्ष हार रहा होगा, वे उसी की तरफ से लड़ेंगे’ देवी बगलामुखी की ‘विपरीत परिस्थितियों को पलटने’ वाली शक्ति का यह सबसे बड़ा उदाहरण बनने जा रहा था।

श्रीकृष्ण की चिंता और बर्बरीक का महाबलिदान

भगवान श्रीकृष्ण बर्बरीक की शक्ति और माँ बगलामुखी के दिए बाणों की क्षमता से भली-भांति परिचित थे। वे जानते थे कि यदि कौरवों की सेना हारने लगी, तो अपने वचन के कारण बर्बरीक कौरवों की तरफ से पांडवों पर बाण चला देंगे। और अगले दिन जब पांडव कमजोर पड़ेंगे, तो वे पांडवों की तरफ हो जाएंगे। इस तरह कुरुक्षेत्र में दोनों ओर की सेनाएं खत्म हो जातीं और कोई जीवित नहीं बचता। इस संकट को टालने के लिए श्रीकृष्ण ने एक ब्राह्मण का भेष धारण किया और बर्बरीक से दान में उनका शीश मांग लिया। बर्बरीक ने हंसते-हंसते भगवान कृष्ण के चरणों में अपना सिर काट कर रख दिया।

कलयुग में ‘खाटू श्याम’ के रूप में मिली पहचान

बर्बरीक की इस महान भक्ति और बलिदान को देखकर भगवान श्रीकृष्ण अत्यंत भावुक हो गए। उन्होंने बर्बरीक के कटे हुए सिर को कुरुक्षेत्र के एक ऊंचे टीले पर रख दिया ताकि वे पूरा युद्ध देख सकें। इसके साथ ही श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलयुग में वे स्वयं कृष्ण के नाम ‘श्याम’ से पूजे जाएंगे और ‘हारे का सहारा’ कहलाएंगे। आज राजस्थान के सीकर में स्थित प्रसिद्ध खाटू श्याम जी मंदिर इसी वीर बर्बरीक का है, जिनकी असीम शक्तियों का मूल आधार माँ बगलामुखी का आशीर्वाद था।

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