क्यों दिया था भृगु ऋषि ने भगवान विष्णु को पैर मारने पर माता लक्ष्मी का भयंकर श्राप? जानिए पूरी कथा

Dharam Desk: पौराणिक कथाओं के अनुसार, भृगु ऋषि द्वारा माता लक्ष्मी (और भगवान विष्णु) को श्राप देने की कथा बेहद रोचक है। यह घटना श्रीमद्भागवत पुराण और पद्म पुराण में मिलती है, जो इस प्रकार है:

कथा का कारण: त्रिदेवों की परीक्षा

एक बार सरस्वती नदी के तट पर ऋषि-मुनियों की एक विशाल सभा हुई। वहाँ इस बात पर बहस छिड़ गई कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) में से सबसे शांत, धैर्यवान और सर्वश्रेष्ठ देवता कौन हैं?

इस बात का पता लगाने के लिए महर्षि भृगु (जो ब्रह्मा जी के मानस पुत्र थे) को चुना गया। वे त्रिदेवों की परीक्षा लेने के लिए निकल पड़े।

ब्रह्मा जी और शिव जी की परीक्षा

सबसे पहले भृगु ऋषि अपने पिता ब्रह्मा जी के पास गए। वहाँ उन्होंने न तो ब्रह्मा जी को प्रणाम किया और न ही उनकी स्तुति की। ब्रह्मा जी क्रोधित हो गए, लेकिन अपने पुत्र जानकर उन्होंने क्रोध शांत कर लिया।

इसके बाद वे भगवान शिव के पास गए। शिव जी ने अपने भाई (भृगु) को गले लगाना चाहा, लेकिन भृगु ऋषि ने उन्हें रोकते हुए कहा कि आप भस्म लगाते हैं और पवित्र नहीं हैं। इस पर शिव जी अत्यंत क्रोधित हो गए और उन्होंने अपना त्रिशूल उठा लिया, लेकिन माता पार्वती ने उन्हें शांत किया।

वैकुंठ में भगवान विष्णु की परीक्षा

अंत में, भृगु ऋषि वैकुंठ धाम पहुँचे। उस समय भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग पर सो रहे थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं। भृगु ऋषि ने बिना सोचे-समझे सोते हुए भगवान विष्णु की छाती पर ज़ोर से एक लात (प्रहार) मार दी।

भगवान विष्णु की विनम्रता और लक्ष्मी जी का क्रोध

जैसे ही भृगु ऋषि ने पैर मारा, भगवान विष्णु तुरंत उठ बैठे। वे क्रोधित होने के बजाय बेहद विनम्रता से भृगु ऋषि के पैर पकड़कर दबाने लगे और बोले:

 “ऋषिवर! आपके कोमल पैर में चोट तो नहीं लगी? मेरी छाती तो वज्र के समान कठोर है।”

भगवान विष्णु की इस सहनशीलता और क्षमाशीलता को देखकर भृगु ऋषि की आँखों में आँसू आ गए और उन्होंने मान लिया कि भगवान विष्णु ही त्रिदेवों में सबसे शांत और सर्वश्रेष्ठ हैं।

माता लक्ष्मी का श्राप

भगवान विष्णु तो शांत रहे, लेकिन माता लक्ष्मी अपनी आँखों के सामने अपने स्वामी के वक्षस्थल (छाती) पर पैर का प्रहार सहन नहीं कर सकीं। वे अत्यंत क्रोधित हो गईं। उन्होंने भृगु ऋषि से कहा:

 “हे ऋषि! आपने वैकुंठ और मेरे स्वामी का अपमान किया है। भगवान विष्णु का हृदय (वक्ष) मेरा निवास स्थान है, और आपने वहीं प्रहार किया है। इसलिए मैं आपको और पूरी ब्राह्मण जाति को श्राप देती हूँ कि आज के बाद मैं (लक्ष्मी) कभी भी ब्राह्मणों के घर स्थायी रूप से वास नहीं करूँगी। ब्राह्मण सदैव दरिद्र और भिक्षा पर निर्भर रहेंगे।”

श्राप का समाधान और परिणाम

माता लक्ष्मी के इस भयानक श्राप को सुनकर भृगु ऋषि को अपनी भूल का अहसास हुआ। उन्होंने माता लक्ष्मी से क्षमा मांगी और कहा कि उन्होंने यह सब केवल संसार के कल्याण और त्रिदेवों की परीक्षा के लिए किया था, उनका कोई व्यक्तिगत अहंकार नहीं था।

भृगु ऋषि के पश्चाताप को देखकर माता लक्ष्मी का क्रोध शांत हुआ। उन्होंने कहा:

 “मेरा श्राप पूरी तरह खाली नहीं जा सकता, लेकिन जो भी ब्राह्मण सच्चे मन से भगवान विष्णु की भक्ति करेगा और ‘भृगु संहिता’ (ज्योतिष ग्रंथ जो भृगु ऋषि ने लिखा) का अध्ययन करेगा, उसे धन की कमी नहीं होगी। ज्ञान ही ब्राह्मणों का असली धन होगा।”

इस घटना के बाद भृगु ऋषि ने समाज और ब्राह्मणों के कल्याण के लिए ‘भृगु संहिता’ की रचना की, ताकि लोग ज्योतिष और कर्मों के माध्यम से अपना जीवन सुधार सकें।

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