परिवर्तन ही संसार का नियम है: श्रीमद्भगवद्गीता के वो 5 संदेश जो आज भी हैं सबसे बड़े मार्गदर्शक

Dharam Desk: ‘गीता सार’ (Gita Saar) वास्तव में महाभारत के युद्ध के दौरान भगवान श्री कृष्ण (जो भगवान विष्णु के ही पूर्ण अवतार हैं) द्वारा अर्जुन को दिए गए निष्काम कर्म और आत्मज्ञान के उपदेशों का निचोड़ है।

यदि इसे संक्षेप में समझें, तो इसके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

गीता का मुख्य संदेश (The Core Essence)

  •  क्यों व्यर्थ चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो?
  • कौन तुम्हें मार सकता है? आत्मा न कभी पैदा होती है और न मरती है। यह अजर-अमर है।
  •  जो हुआ, वह अच्छा हुआ; जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है; जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा।
  •  अतीत का पछतावा न करो और भविष्य की चिंता मत करो। वर्तमान में जियो।
  •  तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया?
  •  तुमने क्या पैदा किया था, जो नष्ट हो गया? तुम खाली हाथ आए थे और खाली हाथ ही चले जाओगे। जो आज तुम्हारा है, कल किसी और का था, परसों किसी और का होगा।
  • परिवर्तन ही संसार का नियम है।
  • जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। इसलिए मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया मन से मिटा दो।
  • कर्म करो, फल की इच्छा मत करो।
  • मनुष्य का अधिकार सिर्फ अपने कर्म पर है, उसके परिणाम पर नहीं। इसलिए फल की चिंता छोड़कर सही दिशा में अपना कर्तव्य निभाते रहो।

जीवन में उतारने योग्य 3 मुख्य सूत्र

मन पर नियंत्रण (Control Over Mind)

“चंचल मन को केवल अभ्यास और वैराग्य से ही वश में किया जा सकता है। जिसका मन उसके वश में नहीं है, वह उसका सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है।”

वासना, क्रोध और लोभ से दूरी

ये तीनों (काम, क्रोध, लोभ) नरक के द्वार हैं। ये इंसान की बुद्धि और विवेक को नष्ट कर देते हैं। इनसे दूर रहकर ही आत्मिक शांति संभव है।

पूर्ण समर्पण (Surrender to Divine)

 “जो हुआ वह ईश्वर की इच्छा से हुआ, जो हो रहा है वह भी उसी की मर्जी है।”

जब मनुष्य खुद को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देता है, तो वह भय, चिंता और शोक के बंधनों से मुक्त हो जाता है।

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